शहीद उधम सिंह, तुम्हें शत-शत नमन
December 26, 2006
क्या आपको पता है कि आज शहीद उधम सिंह कि जयन्ती है। कोई बात नहीं अगर नहीं भी पता तो जब कहीं इस बारे में बात ही नहीं होती तो कहाँ से पता चले। सब अखबार वालों ने एक पैराग्राफ में इस खबर को निपटा दिया वो भी बिल्कुल अंदर के पृष्टों पर। टीवी वालों की तो बात ही छोड़िए। न ही किसी राजनीतिक दल ने उनको याद किया। पता है क्यों क्योंकि वे आज बिकते नहीं गांधी बिकते हैं। क्योंकि उन्होंने और अन्य शहीदों ने देश को आजाद थोड़े ही न कराया वो तो सिर्फ गांधी ने कराया। कुछ दिन पहले चली थी यह बहस काफी देश में भी और हमारे चिट्ठाजगत में भी। क्या गलत बोले थे रामदेव बाबा। राजनीतिक द्लों ने उन्हें क्यों याद न किया क्योंकि वे कांग्रेस आदि दल में जो न थे। कौन कहता है ये शहीद महान थे, उन्होंने कुर्बानी दी सब झूठ है कुर्बानी तो बस उन्होंने दी न जिनके नाम के पीछे गांधी या नेहरु लगा था। बाघा जतिन को कोई जानता है आज, ये गांधी के आने से बहुत पहले ही एक समय भारत के सबसे प्रसिद्ध नेता थे आज किसी बच्चे को मालूम है लाला हरदयाल कौन थे। वीर सावरकर क्यों हाशिए पर ला दिए गए क्योंकि उनका कसूर मात्र इतना था कि वे हिंदूवादी थे सिर्फ इस गुनाह के कारण उनका सब बलिदान भुला दिया गया। ये सब कैसे हुआ ? आजादी से पहले कांग्रेस का ने इन सब शहीदों का विरोध किया उन्हें आतंकवादी कहा, नेताजी को अपने रास्ते से हटवाया और और आजादी के बाद एक योजना के तहत नई पीढ़ी को उनके बारे में न पढ़ाया जाए न बताया जाए, ऐसा प्रबंध किया जिससे नई पीढ़ी को केवल यह पता हो कि देश को आजाद कराया सिर्फ गांधी और नेहरू ने। क्योंकि ये लोग कांग्रेस से जुडे थे और इनके नाम पे हमेशा हमें वोट मिलता रहे। आज फैशन है कि गांधीवाद का, गांधीगिरी का भगवान को गाली दो लेकिन गांधी की जरा भी आलोचना न करो। अब आप कहेंगे कि इसमें गांधी का क्या कसूर है, है कसूर लेकिन उसकी बात कभी बाद में अलग से करुँगा। हमें पढ़ाया जाता है, बताया जाता है यही सब। गांधी जी ने अफ्रीका से आने के बाद अंग्रेजों की कभी एक लाठी भी न खाई। इन शहीदों ने क्या तप किया, क्यों वे इन गांधी और गांधीभक्तों से भिन्न थे जानना है तो कभी उनकी जीवनियाँ पढ़ो। लेकिन कौन पढ़े लोग कौन सा इनको याद करते हैं उन्हें तो आज मुन्नाभाई की गांधीगिरी देखनी है वो मुन्नाभाई जिस पर ड्र्ग्स, अवैध हथियार तथा लाखों लोगों के कत्ल में शामिल होने के आरोप हैं। किए जाओ भाई गांधीगिरी। महान है ये गांधीगिरी।
क्रांतिवीर उधम सिंह का जन्म पंजाब-प्रांत के ग्राम सुनाम (जनपद – संगरुर) में २६ दिसंबर १८९९ को हुआ था। इनके पिता का नाम टहल सिंह था। वर्ष १९१९ का जलियांवाला बाग का जघन्य नरसंहार उन्होंने अपनी आँखों से देखा था। उन्होंने देखा था कि कुछ ही क्षणों में जलियांवाला बाग खून में नहा गया और असहाय निहत्थे लोगों पर अंग्रेजी शासन का बर्बर अत्याचार और लाशों का अंबार। उन्होंने इसी दिन इस नरसंहार के नायक जनरल डायर से बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी। प्रतिशोध की आग में जलते हुए यह नर-पुंगव दक्षिण-अफ्रीका तथा अमरीका होते हुए वर्ष १९२३ में इंग्लैंड पहुँचा। वर्ष १९२८ में भगतसिंह के बुलाने पर उन्हें भारत आना पड़ा। १९३३ में वह पुनः लंदन पहुँचे। तब तक जनरल डायर मर चुका था, किंतु उसके अपराध पर मोहर लगाने वाला सर माइकल-ओ-डायर तथा लॉर्ड जेटलैंड अभी जीवित था।
१३ मार्च १९४० को उन्हें अपने हृदय की धधकती आग को शांत करने का मौका मिला। उस दिन लंदन की एक गोष्ठी में दोनों अपराधी उपस्थित थे। उधमसिंह धीरे-धीरे चुपके से जाकर मंच से कुछ दूरी पर बैठ गए। सर माइकल-ओ-डायर जैसे ही भारत के विरुद्ध उत्तेजक भाषण देने के पश्चात मुड़े, उधमसिंह ने उस पर गोली दाग दी। वह वहीं ढेर हो गया। लॉर्ड जेटलैंड भी बुरी तरह घायल हो गया। सभा में भगदड़ मच गई पर उधमसिंह भागे नहीं। वह दृढ़ता से खड़े रहे और सीना तानकर कहा – “माइकल को मैंने मारा है।” मुकदमा चलने पर अदालत में अपना बयान देते हुए उन्होंने सपष्ट कहा था – “यह काम मैंने किया माइकल असली अपराधी था। उसके साथ ऐसा ही किया जाना चाहिए था। वह मेरे देश की आत्मा को कुचल देना चाहता था। मैंने उसे कुचल दिया। पुरे २१ साल तक मैं बदले की आग में जलता रहा। मुझे खुशी है कि मैंने यह काम पूरा किया। मैं अपने देश के लिए मर रहा हूँ। मेरा इससे बड़ा और कया सम्मान हो सकता है कि मैं मातृभूमि के लिए मरुँ।” इस प्रकार उस मृत्युंजयी बलिदानी ने मातृभूमि के चरणों में हँसते-हँसते अपने प्राणों की भेंट चढ़ा दी। उनका बलिदान हमें देशभक्ति व राष्ट्रीय एकता की भावना की प्रेरणा देता रहेगा।
आज जिस लोक में वे हों क्या उन देशभक्तों को उनकी उपेक्षा पर दुख हो रहा होगा ? बिल्कुल नहीं क्योंकि उनका जीवन गीता के निष्काम कर्म का जीवंत उदाहरण था। उनकी खासियत ही यही थी कि उन्हें बस सरफरोशी की तमन्ना थी बदले में कुछ चाहते होते तो कांग्रेसियों की तरह धरने-सत्याग्रह करते और नेता बनते।
आओ कम से कम हम लोग मिलकर उस शहीद को अपनी श्रद्दांजली दें। हे अमर शहीद हुतात्मा उधम-सिंह तुम्हे जन्मदिन मुबारक ! शत-शत नमन तुम्हारी शहादत को !
संबंधित कड़ियाँ:
विकीपीडिया पर उधम-सिंह पर लेख
दैनिक जागरण में शहीद उधम-सिंह का संक्षिप्त परिचय
Udham Singh – A short biographical sketch




December 27, 2006 at 7:23 am
श्रीश जी आपको शुभकामनाऐ की आप देश के सच्चे देश भक्त को याद तथा हमें भी उनके बारे मे जानकारी देकर याद करवाऐ रखा।
आज भी कई ऐसे देश भक्त अतीत मे खोये हुऐ है जिनका बलिदान किसी भी मायने मे कम नही था, पर हमारी व्यवस्था ही ऐसी है जो हमे देश भक्तो के बलिदानो को भूलने/भूलाने को प्रेरित करती है।
ऐसी व्यवस्था तथा शिक्षा प्राणली को बदलना होगा।
December 27, 2006 at 10:34 am
उधमसिंह एक महान क्रांतिकारी थे, उन्हे मेरी हार्दिक श्रद्धांजली!
लेकिन मेरी समझ मे ये नही आता कि उधमसिंह की महानता गांधी नेहरू की आलोचना करने से कैसे बढ जायेगी ? क्या किसी भी शहीद को महान सिद्ध करने के लिये उसे किसी और से तुलना करना(किसी और की आलोचना) जरूरी है ?
देश के लिये हर किसी का अपना अपना योगदान रहा है, क्या हम इन्हे अलग अलग नही देख सकते ?
December 27, 2006 at 3:13 pm
शहीद को हमारी श्रद्धांजली. जानकारीपूर्ण लेख के लिए साधूवाद.
December 27, 2006 at 5:06 pm
@ Pramendra Pratap Singh,
सही कहते हैं प्रमेन्द्र जी आप, इस शिक्षा-प्रणाली में ही कमी है। पहले अंग्रेज गलत पढ़ाते थे अब अपने मार्क्सवादी इतिहासकारों का बनाया गलत इतिहास हमारी सरकार पढ़ा रही है। हमें पढ़ाया जाता है कि हमारे पूर्वज आर्य बाहर से आए थे, गोमांस खाते थे, सिख गुरु लुटेरे थे आदि-आदि और अगर कोई सरकार इस गलत पाठयक्रम को बदलना भी चाहती है तो ये लोग हल्ला मचा देते हैं कि सरकार भगवाकरण कर रही है।
@ आशीष,
आशीष भाई, पोस्ट ध्यान से पढिए। मेरा निशाना गांधी नहीं उनके तथाकथित चेले हैं जो जानबूझकर अन्य शहीदों का अपमान करने पर तुले हैं। इसका एक सामान्य उदाहरण है अंडमान-निकोबार में वीर सावरकर का चित्र हटाया जाना।
@ संजय बेंगाणी,
संजय जी, इस विषय पर मेरा विचार था आपकी टिप्पणी कुछ लम्बी होगी।
December 27, 2006 at 6:24 pm
श्रीशजी टिप्पणी क्या इस विषय पर तो लेख के लेख लिखने को तैयार हैं. पर महाराज मुझे जो कहना था वो तो आप ही कह गए.
वैसे चिट्ठाजगत गौर करे श्रीशजी गुजरात के नहीं है और न ही मोदी की छाया तले उनकी व्यवसायिक मजबुरीयाँ है, फिर भी ऐसा लिख रहे हैं…इसमें हमारा कोई हाथ नहीं है. ये इनके अपने नितांत निजी विचार हैं.
सावरकर की नामपट्टी चापलूस मणीशंकर ने हटवाई थी. जब किसीका खुन खौलेगा वापस लगा दी जाएगी.
December 27, 2006 at 8:25 pm
हार्दिक श्रद्धांजली!
December 28, 2006 at 4:11 am
जब मैं गान्धी की जीवनी आदि पढता हूँ, तो मुझे यही लगता है की गान्धी एक बहुत ही अच्छे आदमी थे. कुछ ज्यादा ही अच्छे
यह आदमी कभी किसी को बुरा/भला नहीं कह सकता था … और यही बात इस व्यक्ति की सबसे बङी कमी थी.
जो आदमी देश को चलाये, उस आदमी में भावनाओं की कोई जगह नहीं होती.
अगर बात देश की हो तो एक दो लोगों का खून बहाने में कोई बुराई नहीं है.
एक सफल राजनीतिज् वह है, जिसमे देश प्रेम के साथ कुटिलता और सहनशीलता भी हो. अगर उसे किसी को सजा देने के लिये, उसका सर भी काटना पङे, तो उसके हाथ नहीं कांपने चाहिये …
गान्धी / नेहरू ..यह सब लोग बहुत ही कमजोर मानसिकता के लोग थे. और उनकी कमजोरी के कारण ही, आज भारत के तीन टुकङे हैं
अगर 50 साल पहले, यानी की बस एक पीढी पहले के यह नेता, अपना हृदय कठोर करके भारत के टुकङे होने से रोक लेते तो शायद आज गान्धी / नेहरू को सामान्य लोगों की गाली नहीं खानी पङती.
इस देश को गान्धी जैसे लोगो की जरूरत नहीं है … इस देश को तो चाणक्य जैसे राजनीतिज्ञ चाहिये … जो जरूर पङने पर देश के हित की रक्षा कर सकें
वैसे मुझे मालूम है की अब मुझे बेदम गालीयां पङेगी … देश के पिता को जो भला बुरा कह दिया है.
पर भाइयों, गाली देते समय जरा ध्यान रखियेगा.. कहीं मुझे ज्यादा जोर की चोट न लग जाये
उधम सिंह जी: फिकर नाट. हम लोग हैं ना… हम आपका बलिदान बेकार थोङे ही जाने देंगे. अभी भी इस देश में ऐसे लोग हैं जो देश के लिये कुछ करने के लिये हमेशा तैयार हैं.
श्रीश जी को आप देख ही रहे हैं … यह भी गरम खून वाले आदमी है
जय हिन्द !
December 28, 2006 at 10:48 pm
बहुत अच्छी जानकारी दी है आपने शहीद उधम सिंह के बारे में !
April 22, 2007 at 2:37 pm
आज कौन जानता है या जानना चाहता है बाल,पाल लाल,या उधम सिंह या फ़िर
आजाद ,अशफ़ाक उल्ला खां या बिस्मिल को जिक्र कीजीये लोग हैरत से देखेगे और कहेगे कोई और काम नही है खाली दिमाग शैतान का घर होता है कुछ काम करो उसमे ध्यान दो,यही है हमारी शहीदो को श्रधांजली,
“इक आरजू लिये आजादी की जिन्दगी अपनी मिटा दी यारो
आखो मे न सही दिल मे ही आंसू का इक कतरा तो गिरालो यारो”