क्या आपको पता है कि आज शहीद उधम सिंह कि जयन्ती है। कोई बात नहीं अगर नहीं भी पता तो जब कहीं इस बारे में बात ही नहीं होती तो कहाँ से पता चले। सब अखबार वालों ने एक पैराग्राफ में इस खबर को निपटा दिया वो भी बिल्कुल अंदर के पृष्टों पर। टीवी वालों की तो बात ही छोड़िए। न ही किसी राजनीतिक दल ने उनको याद किया। पता है क्यों क्योंकि वे आज बिकते नहीं गांधी बिकते हैं। क्योंकि उन्होंने और अन्य शहीदों ने देश को आजाद थोड़े ही न कराया वो तो सिर्फ गांधी ने कराया। कुछ दिन पहले चली थी यह बहस काफी देश में भी और हमारे चिट्ठाजगत में भी। क्या गलत बोले थे रामदेव बाबा। राजनीतिक द्लों ने उन्हें क्यों याद न किया क्योंकि वे कांग्रेस आदि दल में जो न थे। कौन कहता है ये शहीद महान थे, उन्होंने कुर्बानी दी सब झूठ है कुर्बानी तो बस उन्होंने दी न जिनके नाम के पीछे गांधी या नेहरु लगा था। बाघा जतिन को कोई जानता है आज, ये गांधी के आने से बहुत पहले ही एक समय भारत के सबसे प्रसिद्ध नेता थे आज किसी बच्चे को मालूम है लाला हरदयाल कौन थे। वीर सावरकर क्यों हाशिए पर ला दिए गए क्योंकि उनका कसूर मात्र इतना था कि वे हिंदूवादी थे सिर्फ इस गुनाह के कारण उनका सब बलिदान भुला दिया गया। ये सब कैसे हुआ ? आजादी से पहले कांग्रेस का ने इन सब शहीदों का विरोध किया उन्हें आतंकवादी कहा, नेताजी को अपने रास्ते से हटवाया और और आजादी के बाद एक योजना के तहत नई पीढ़ी को उनके बारे में न पढ़ाया जाए न बताया जाए, ऐसा प्रबंध किया जिससे नई पीढ़ी को केवल यह पता हो कि देश को आजाद कराया सिर्फ गांधी और नेहरू ने। क्योंकि ये लोग कांग्रेस से जुडे थे और इनके नाम पे हमेशा हमें वोट मिलता रहे। आज फैशन है कि गांधीवाद का, गांधीगिरी का भगवान को गाली दो लेकिन गांधी की जरा भी आलोचना न करो। अब आप कहेंगे कि इसमें गांधी का क्या कसूर है, है कसूर लेकिन उसकी बात कभी बाद में अलग से करुँगा। हमें पढ़ाया जाता है, बताया जाता है यही सब। गांधी जी ने अफ्रीका से आने के बाद अंग्रेजों की कभी एक लाठी भी न खाई। इन शहीदों ने क्या तप किया, क्यों वे इन गांधी और गांधीभक्तों से भिन्न थे जानना है तो कभी उनकी जीवनियाँ पढ़ो। लेकिन कौन पढ़े लोग कौन सा इनको याद करते हैं उन्हें तो आज मुन्नाभाई की गांधीगिरी देखनी है वो मुन्नाभाई जिस पर ड्र्ग्स, अवैध हथियार तथा लाखों लोगों के कत्ल में शामिल होने के आरोप हैं। किए जाओ भाई गांधीगिरी। महान है ये गांधीगिरी।

क्रांतिवीर उधम सिंह का जन्म पंजाब-प्रांत के ग्राम सुनाम (जनपद – संगरुर) में २६ दिसंबर १८९९ को हुआ था। इनके पिता का नाम टहल सिंह था। वर्ष १९१९ का जलियांवाला बाग का जघन्य नरसंहार उन्होंने अपनी आँखों से देखा था। उन्होंने देखा था कि कुछ ही क्षणों में जलियांवाला बाग खून में नहा गया और असहाय निहत्थे लोगों पर अंग्रेजी शासन का बर्बर अत्याचार और लाशों का अंबार। उन्होंने इसी दिन इस नरसंहार के नायक जनरल डायर से बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी। प्रतिशोध की आग में जलते हुए यह नर-पुंगव दक्षिण-अफ्रीका तथा अमरीका होते हुए वर्ष १९२३ में इंग्लैंड पहुँचा। वर्ष १९२८ में भगतसिंह के बुलाने पर उन्हें भारत आना पड़ा। १९३३ में वह पुनः लंदन पहुँचे। तब तक जनरल डायर मर चुका था, किंतु उसके अपराध पर मोहर लगाने वाला सर माइकल-ओ-डायर तथा लॉर्ड जेटलैंड अभी जीवित था।

१३ मार्च १९४० को उन्हें अपने हृदय की धधकती आग को शांत करने का मौका मिला। उस दिन लंदन की एक गोष्ठी में दोनों अपराधी उपस्थित थे। उधमसिंह धीरे-धीरे चुपके से जाकर मंच से कुछ दूरी पर बैठ गए। सर माइकल-ओ-डायर जैसे ही भारत के विरुद्ध उत्तेजक भाषण देने के पश्चात मुड़े, उधमसिंह ने उस पर गोली दाग दी। वह वहीं ढेर हो गया। लॉर्ड जेटलैंड भी बुरी तरह घायल हो गया। सभा में भगदड़ मच गई पर उधमसिंह भागे नहीं। वह दृढ़ता से खड़े रहे और सीना तानकर कहा – “माइकल को मैंने मारा है।” मुकदमा चलने पर अदालत में अपना बयान देते हुए उन्होंने सपष्ट कहा था – “यह काम मैंने किया माइकल असली अपराधी था। उसके साथ ऐसा ही किया जाना चाहिए था। वह मेरे देश की आत्मा को कुचल देना चाहता था। मैंने उसे कुचल दिया। पुरे २१ साल तक मैं बदले की आग में जलता रहा। मुझे खुशी है कि मैंने यह काम पूरा किया। मैं अपने देश के लिए मर रहा हूँ। मेरा इससे बड़ा और कया सम्मान हो सकता है कि मैं मातृभूमि के लिए मरुँ।” इस प्रकार उस मृत्युंजयी बलिदानी ने मातृभूमि के चरणों में हँसते-हँसते अपने प्राणों की भेंट चढ़ा दी। उनका बलिदान हमें देशभक्ति व राष्ट्रीय एकता की भावना की प्रेरणा देता रहेगा।

आज जिस लोक में वे हों क्या उन देशभक्तों को उनकी उपेक्षा पर दुख हो रहा होगा ? बिल्कुल नहीं क्योंकि उनका जीवन गीता के निष्काम कर्म का जीवंत उदाहरण था। उनकी खासियत ही यही थी कि उन्हें बस सरफरोशी की तमन्ना थी बदले में कुछ चाहते होते तो कांग्रेसियों की तरह धरने-सत्याग्रह करते और नेता बनते।

आओ कम से कम हम लोग मिलकर उस शहीद को अपनी श्रद्दांजली दें। हे अमर शहीद हुतात्मा उधम-सिंह तुम्हे जन्मदिन मुबारक ! शत-शत नमन तुम्हारी शहादत को !

संबंधित कड़ियाँ:

विकीपीडिया पर उधम-सिंह पर लेख
दैनिक जागरण में शहीद उधम-सिंह का संक्षिप्त परिचय
Udham Singh – A short biographical sketch

सोमवार २० नवम्बर, २००६ के दैनिक जागरण में पाठकनामा स्तंभ में एक पाठक का पत्र पढ़ा, जिस पर मेरे विचार से हम सब को गौर करना चाहिए।

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया ने अपने देश में रह रहे मुस्लिम नागरिकों को यह स्पष्ट कर दिया कि अगर वे देश के कानून को नहीं मानते तो वह देश छोड़कर जा सकते हैं। यहाँ के प्रधानमंत्री ने मुसलमानों की एक सभा में कहा कि ऑस्ट्रेलिया एक लोकतांत्रिक और सेक्युलर देश है। यहाँ सारे कानून संसद वनाती है और देश में एक ही कानून चलेगा, यदि कोई संसद से स्वीकृत कानून के अतिरिक्त शरिया कानून मानता है तो वह देश छोड़कर वहाँ जाकर रह सकता है जहाँ शरियत कानून चलता है। यह देश उन्हीं के लिए है जो यहाँ का कानून मानता हो। भारत को इससे सबक लेना चाहिए। जहाँ धर्मनिरपेक्षता के नाम तुष्टीकरण की नीति चलायी जाती है। वोट बैंक के लालच में आतंकवादियों तक को सहयोग, सहायता, समर्थन व संरक्षण दिया जाता है।

मधु पोद्दार, पटेल नगर, गाजियाबाद

लेखक ने बिल्कुल सही बात कही है, सरदार पटेल ने भी पाकिस्तान परस्त मुस्लिमों को कहा था कि अगर उन्हें पाकिस्तान से ही प्यार है तो वे वहाँ जाकर रहने के लिए स्वतंत्र हैं। भारत में रहने वाले सभी मुस्लिमों और हमारा खून एक ही है, परंतु फिर भी जो हमें अपना नहीं मानते, हमारे कानून नहीं मानते, हमारा खून बहाते हैं उन्हें हमने कहाँ पकड़ रखा है वे अपने पसंद के देश  क्यों नहीं चले जाते।

कुछ समय पूर्व पीएसएलवी तथा आकाश के परीक्षण असफल हो जाने के बाद शुक्र है कि पृथ्वी प्रक्षेपास्त्र का रविवार को परीक्षण सफल हुआ। आशा है इससे निरुत्साहित हुए रक्षा वैज्ञानिकों में फिर से उत्साह का संचार होगा।

बालासोर (उड़ीसा) : सतह से सतह पर मार करने वाले म्ध्यम दूरी के आधुनिकतम प्रक्षेपास्त्र पृथ्वी का समुद्र की सतह पर चाँदीपुर तट स्थित समन्वित परीक्षण रेंज (आईटीआर) से रविवार को सफल परीक्षण किया गया। हालांकि ७०० किलोग्राम विस्फोटक सामग्री से लदी होने पर मिसाइल की मारक क्षमता १५०-२५० किलोमीटर तक है, लेकिन विस्फोटक सामग्री की जरुरत पड़ने पर इसे एक हजार किलोग्राम तक बढ़ाया जा सकता है। यह १५० किमी तक लक्ष्य भेदने में केवल ३०० सेकेंड लगाती है। आईटीआर सूत्रों ने बताया कि रक्षा अनुसंधान विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित इस मिसाइल को सुबह ९.५५ बजे मोबाइल लाँचर से दागा गया और उसने सफलता पूर्वक लक्ष्य को भेद दिया। मिसाएल की लंबाई ८.६५ मीटर और चौड़ाई १ मीटर है। यह सेना में शामिल कर ली गई है। इसके रखरखाव और संचालन के लिए विशेष तौर पर प्रशिक्षित दो प्रक्षेपास्त्र समूह गठित किए गये हैं।

दैनिक जागरण २० नवम्बर २००६, से साभार

रक्षा वैज्ञानिकों की योजना भविष्य में पीएसएलवी तथा आकाश की मिश्रित प्रौद्योगिकी से अंतरमहाद्विपीय मिसाएल सूर्या बनाने की थी। यदि कुछ समय पूर्व उपरोक्त दोनों के परीक्षण असफल न हुए होते तो शायद इस दिशा में कार्य आरंभ हो चुका होता। अब इन दोंनों का अगला परीक्षण शायद अगले साल तक हो। खैर सहज पके सो मीठा होए यानि Better Late Then Never.